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सुभाष रतनपाल



सार्वजनिक पार्किंग के लिए सफल ट्रायल से लेकर मंदिर निर्माण के लिए आवंटन तक पूरी प्रक्रिया पर सवाल | पांचवीं अनुसूची, अनुच्छेद 244(1), नगर निगम के प्रस्ताव और 2026 के आवंटन आदेश को लेकर हाईकोर्ट में याचिका


जगदलपुर। बस्तर संभाग मुख्यालय जगदलपुर के प्रतापगंज पारा स्थित बेशकीमती शासकीय जमीन को लेकर चल रहा विवाद अब केवल स्थानीय सामाजिक या राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर की चौखट तक पहुंच चुका है। इस विवाद में एक तरफ जैन मंदिर निर्माण के लिए शासकीय जमीन के एक हिस्से के आवंटन का मामला है, तो दूसरी तरफ सर्व आदिवासी समाज और स्थानीय नागरिकों की ओर से जमीन को सार्वजनिक उपयोग, पार्किंग, सामुदायिक गतिविधियों और बस्तर की पारंपरिक-सांस्कृतिक आवश्यकताओं के लिए सुरक्षित रखने की मांग की जा रही है।


रिट याचिका (सी) क्रमांक 5886/2025, दशरथ सिंह कश्यप एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ शासन एवं अन्य में याचिकाकर्ताओं की ओर से राज्य शासन एवं अन्य प्रतिवादियों द्वारा दाखिल जवाब के विरुद्ध विस्तृत रीज्वाइंडर दाखिल किया गया है। इस रीज्वाइंडर में जमीन के आवंटन की पूरी प्रक्रिया पर गंभीर कानूनी और प्रक्रियात्मक सवाल उठाए गए हैं।

दस्तावेजों के अनुसार विवादित जमीन शीट नंबर 78, प्लॉट नंबर 168, प्रतापदेव वार्ड, जैन मंदिर रोड, जगदलपुर में स्थित है और इसका कुल क्षेत्रफल 15,318 वर्गफीट बताया गया है। इसमें से लगभग 7,500 वर्गफीट जमीन जैन मंदिर के निर्माण के लिए आवंटित किए जाने की प्रक्रिया को याचिकाकर्ताओं ने चुनौती दी है।


सिर्फ जमीन का विवाद नहीं, शहर के भविष्य का सवाल भी


याचिकाकर्ताओं का कहना है कि संबंधित जमीन जगदलपुर के घने व्यावसायिक क्षेत्र में स्थित है। यह ऐसा इलाका है जहां पहले से ही पार्किंग और यातायात की समस्या बनी हुई है। ऐसे में शासकीय जमीन का उपयोग किसी निजी धार्मिक संस्था को देने के बजाय बहुमंजिला सार्वजनिक पार्किंग या अन्य जनहितकारी सुविधा के लिए किया जाना चाहिए।

रीज्वाइंडर में दावा किया गया है कि स्थानीय निवासी, व्यापारी संगठन और निर्वाचित पार्षद सहित कई लोग इस जमीन पर सार्वजनिक पार्किंग विकसित करने की मांग करते रहे हैं।

याचिकाकर्ताओं ने अपने जवाब में यह भी बताया है कि जिला प्रशासन ने स्वयं इस जमीन पर 15 दिनों तक सार्वजनिक पार्किंग का ट्रायल कराया था और उस ट्रायल को सफल एवं व्यवहारिक बताया गया था। ऐसे में बाद में निजी सलाहकार की ओर से पार्किंग सुविधा को तकनीकी रूप से अनुपयुक्त बताए जाने वाली रिपोर्ट पर भी सवाल खड़े किए गए हैं।


2018 और 2019 में ही बहुमंजिला पार्किंग का प्रस्ताव


हाईकोर्ट में दाखिल रीज्वाइंडर में इस मामले का इतिहास कई वर्ष पीछे तक ले जाया गया है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, संबंधित जमीन को सार्वजनिक उपयोग में लाने की दिशा में मेयर-इन-काउंसिल द्वारा 22 दिसंबर 2018 और 9 जनवरी 2019 को प्रस्ताव पारित किए गए थे। इन प्रस्तावों में जमीन पर सार्वजनिक बहुमंजिला पार्किंग सुविधा विकसित करने की दिशा में कार्यवाही किए जाने का उल्लेख बताया गया है।

यानी याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जमीन के सार्वजनिक उपयोग की आवश्यकता कोई नई मांग नहीं है, बल्कि नगर स्तर पर इसके लिए वर्षों पहले से प्रस्ताव मौजूद थे।

यही वजह है कि अब यह सवाल उठाया जा रहा है कि जिस जमीन को सार्वजनिक पार्किंग की आवश्यकता को देखते हुए विकसित करने की दिशा में पहले प्रस्तावित किया गया था, उसी जमीन के एक हिस्से को बाद में धार्मिक निर्माण के लिए आवंटित करने की जरूरत क्यों पड़ी?


18 नवंबर 2022 का आदेश बना विवाद का अहम बिंदु


पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक 18 नवंबर 2022 का कलेक्टर कार्यालय का आदेश बताया गया है।

याचिकाकर्ताओं के रीज्वाइंडर के अनुसार, इसी जमीन के आवंटन के लिए पहले किए गए आवेदन को कलेक्टर कार्यालय ने 18.11.2022 को खारिज कर दिया था।

इसमें राजस्व पुस्तक परिपत्र, वॉल्यूम-4, कोड-26 के प्रावधानों का उल्लेख किए जाने का दावा किया गया है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उस समय राजस्व अधिकारियों ने दो महत्वपूर्ण बातें दर्ज की थीं—


पहली, संबंधित जमीन लोक निर्माण विभाग के नाम दर्ज है।


दूसरी, प्रस्तावित स्थल मौजूदा जैन मंदिर से 400 मीटर के भीतर स्थित है।


याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि जब इसी जमीन के आवंटन का आवेदन पहले ही खारिज किया जा चुका था, तो बाद में उसी निजी संस्था के पक्ष में नए सिरे से प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ाई गई?


यही सवाल अब हाईकोर्ट के समक्ष उठाया गया है।

2025 में फिर शुरू हुई जमीन आवंटन की प्रक्रिया

रीज्वाइंडर के अनुसार, पूर्व में आवेदन खारिज होने के बाद भी संबंधित जमीन को लेकर प्रक्रिया फिर आगे बढ़ी।

दस्तावेजों में बताया गया है कि 2025 में जमीन के आवंटन की नई प्रक्रिया शुरू हुई। इसी दौरान स्थानीय नागरिकों और आदिवासी समाज की ओर से आपत्तियां एवं अभ्यावेदन दिए जाने का भी उल्लेख है।

सर्व आदिवासी समाज की ओर से 30 मई 2025 को यह मांग किए जाने की बात कही गई है कि संबंधित जमीन को आदिवासी समाज अथवा आदिम जाति सहकारी समिति को बेरोजगार युवाओं के व्यापार-व्यवसाय, रोजगार और सामुदायिक उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जाए।

समाज की ओर से पहले भी आपत्ति दर्ज कराए जाने का उल्लेख है। 18 फरवरी 2022 को भी सर्व आदिवासी समाज ने लिखित आपत्ति प्रस्तुत की थी।


7 अगस्त 2025 की निजी रिपोर्ट भी सवालों के घेरे में


रीज्वाइंडर में प्रतिवादियों द्वारा पेश की गई 7 अगस्त 2025 की निजी सलाहकार की तकनीकी रिपोर्ट को भी याचिकाकर्ताओं ने चुनौती दी है।

प्रतिवादियों की ओर से यह तर्क दिए जाने का उल्लेख है कि संबंधित जमीन पर बहुमंजिला पार्किंग तकनीकी रूप से व्यवहारिक नहीं है।

लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि प्रशासन स्वयं इसी जमीन पर 15 दिन का सार्वजनिक पार्किंग ट्रायल कर चुका है और उसे सफल बता चुका है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, प्रशासन के अपने मैदानी अनुभव और पहले पारित सार्वजनिक पार्किंग संबंधी प्रस्तावों को बाद में तैयार की गई निजी सलाहकार की रिपोर्ट से दरकिनार नहीं किया जा सकता।


यही बिंदु इस विवाद को और महत्वपूर्ण बनाता है


—एक ही जमीन को पहले सार्वजनिक पार्किंग के लिए व्यवहारिक माना गया और बाद में बहुमंजिला पार्किंग को तकनीकी रूप से अनुपयुक्त बताया गया।


20 अगस्त 2025 के नगर निगम प्रस्ताव पर भी सवाल


रीज्वाइंडर में 20 अगस्त 2025 को मेयर-इन-काउंसिल द्वारा पारित प्रस्ताव का भी उल्लेख है।

याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि संबंधित निर्णय के लिए नगर निगम की सामान्य सभा की आवश्यक वैधानिक स्वीकृति नहीं ली गई।

उनका तर्क है कि केवल मेयर-इन-काउंसिल अथवा किसी कार्यकारी समिति की कार्यवाही पूर्ण परिषद की वैधानिक मंजूरी का विकल्प नहीं हो सकती।

यदि यह आपत्ति न्यायालय के समक्ष प्रमाणित होती है, तो इससे संबंधित नगर निगम की कार्यवाही की वैधानिकता पर सवाल खड़ा हो सकता है। हालांकि इसका अंतिम निर्धारण न्यायालय द्वारा ही किया जाना है।


10 फरवरी 2026 का आवंटन आदेश और 12 फरवरी की डीड


मामले में एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम बाद में सामने आया।

रीज्वाइंडर में याचिकाकर्ताओं ने बताया है कि 10 फरवरी 2026 को आवंटन आदेश जारी हुआ और उसके बाद 12 फरवरी 2026 को डीड निष्पादित की गई।

प्रतिवादियों की ओर से यह प्रारंभिक आपत्ति उठाई गई थी कि याचिकाकर्ताओं ने इन बाद के आदेशों को अलग से चुनौती नहीं दी है।

इसके जवाब में याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में कहा है कि उन्होंने मूल रूप से पूरी राजस्व कार्यवाही की बुनियाद को ही चुनौती दी है। उनका तर्क है कि यदि मूल कार्यवाही ही कानूनन गलत अथवा असंवैधानिक पाई जाती है तो उसके आधार पर बाद में जारी होने वाले आदेश और डीड भी स्वतः प्रभावित होंगे।

रीज्वाइंडर में यह भी कहा गया है कि 6 नवंबर 2025 को याचिका दायर किए जाने के समय बाद में जारी होने वाला कोई आवंटन आदेश मौजूद नहीं था, इसलिए उस समय उसे चुनौती देना संभव नहीं था।


पांचवीं अनुसूची और अनुच्छेद 244(1) का मुद्दा सबसे अहम


इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू संविधान की पांचवीं अनुसूची और अनुच्छेद 244(1) से जुड़ा हुआ है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि संबंधित जमीन संवैधानिक रूप से अधिसूचित अनुसूचित क्षेत्र में स्थित है।

रीज्वाइंडर में यह तर्क दिया गया है कि पांचवीं अनुसूची और अनुच्छेद 244(1) का उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय के हितों और सार्वजनिक/सामुदायिक संसाधनों की सुरक्षा करना है।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया है कि सरकारी जमीन को किसी गैर-आदिवासी निजी संस्था के पक्ष में आवंटित करने को महज “आवंटन” कह देने से संवैधानिक सुरक्षा समाप्त नहीं हो जाती।


सुप्रीम कोर्ट के ‘समता’ फैसले का भी हवाला


याचिकाकर्ताओं ने अपने रीज्वाइंडर में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले Samatha Vs. State Of Andhra Pradesh (1997) 8 SCC 191 का हवाला दिया है।

उनका कहना है कि इस फैसले में अनुसूचित क्षेत्रों में सरकारी जमीन को गैर-आदिवासी निजी व्यक्तियों या निजी संस्थाओं के पक्ष में हस्तांतरित करने से जुड़े संवैधानिक संरक्षण को महत्वपूर्ण माना गया है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि किसी सरकारी जमीन को “आवंटन” कहने मात्र से यदि उसका वास्तविक परिणाम अनुसूचित क्षेत्र की सार्वजनिक संपत्ति को किसी निजी गैर-आदिवासी संस्था के उपयोग में देना है, तो उस पर संविधान की पांचवीं अनुसूची के संदर्भ में विचार किया जाना आवश्यक है।

यह याचिकाकर्ताओं का कानूनी तर्क है; इसकी अंतिम वैधानिकता और इस मामले पर इसकी लागू होने की सीमा का फैसला हाईकोर्ट करेगा।

अनुच्छेद 14 और 21 का भी उल्लेख

याचिकाकर्ताओं ने केवल पांचवीं अनुसूची तक मामला सीमित नहीं रखा है।

रीज्वाइंडर में यह भी तर्क दिया गया है कि बहुमूल्य शहरी सार्वजनिक जमीन को सार्वजनिक सुविधा के लिए उपयोग करने के बजाय निजी धार्मिक संस्था के पक्ष में देने से स्थानीय नागरिकों के अधिकार प्रभावित होते हैं।

इसी संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 का उल्लेख किया गया है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नागरिकों को सार्वजनिक सुविधाओं, यातायात व्यवस्था और सार्वजनिक संपत्ति के उचित उपयोग से वंचित नहीं किया जा सकता और राज्य को सार्वजनिक संपत्ति का उपयोग जनहित एवं सार्वजनिक न्यास की भावना के अनुरूप करना चाहिए।

स्थानीय आदिवासी समाज के अभ्यावेदन को भी चुनौती नहीं माना जा सकता—याचिकाकर्ता

प्रतिवादियों की ओर से स्थानीय निवासियों एवं छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज के अभ्यावेदनों की उपयोगिता पर सवाल उठाए जाने के जवाब में याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि केवल इसलिए किसी प्रतिनिधित्व को महत्वहीन नहीं माना जा सकता कि संबंधित पक्ष ने राजस्व प्रकरण में सक्रिय रूप से भाग नहीं लिया।

रीज्वाइंडर में दावा किया गया है कि छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज ने राज्यपाल के समक्ष भी विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत किया है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जब अनुसूचित क्षेत्र और सामुदायिक हित से जुड़े गंभीर सवाल उठाए गए हैं और मामला उच्च संवैधानिक पदाधिकारी के समक्ष भी लंबित है, तब स्थानीय राजस्व अधिकारियों द्वारा जल्दबाजी में प्रक्रिया पूरी करना उचित नहीं है।


आदिवासी समाज का आरोप—मामला सिर्फ जमीन का नहीं, आस्था और संस्कृति का है


इसी बीच जमीन को लेकर सर्व आदिवासी समाज और विभिन्न मूलनिवासी संगठनों का आंदोलन भी तेज हुआ।

समाज की ओर से लगातार यह मांग की जाती रही है कि प्रतापगंज पारा की इस महत्वपूर्ण शासकीय जमीन को किसी एक निजी संस्था को देने के बजाय आदिवासी समाज के सामुदायिक उपयोग, बस्तर दशहरा और अन्य पारंपरिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए सुरक्षित रखा जाए।


समाज का कहना है कि प्रतापगंज पारा की जमीन उनके लिए महज सरकारी भूमि नहीं है, बल्कि इसका संबंध उनकी सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था से भी है।

नगर निगम घेराव से सड़क तक पहुंचा विरोध

भूमि आवंटन के विरोध में सर्व आदिवासी समाज, मूलनिवासी संगठनों और विभिन्न सामाजिक प्रतिनिधियों की ओर से नगर निगम कार्यालय का घेराव और प्रदर्शन भी किया गया।

प्रदर्शन के दौरान महापौर और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ नारेबाजी हुई।

प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी समाज विशेष के खिलाफ नहीं है। उनका दावा है कि वे सरकारी संपत्ति के संरक्षण और शहर के सार्वजनिक हित को लेकर आवाज उठा रहे हैं।

उनकी प्रमुख मांग रही कि इतनी महत्वपूर्ण और व्यावसायिक क्षेत्र में स्थित जमीन का उपयोग—

सार्वजनिक पार्किंग,

सामुदायिक भवन,

सार्वजनिक सुविधा केंद्र,

रोजगार एवं व्यवसायिक गतिविधियों

जैसे जनहितकारी कार्यों के लिए किया जाए।


विश्व आदिवासी दिवस से ठीक पहले फिर गरमाया विवाद


अब यह विवाद 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस से ठीक पहले एक बार फिर गरमा गया।

कलेक्ट्रेट स्थित आस्था सभाकक्ष में विश्व आदिवासी दिवस के आयोजन की तैयारियों को लेकर जिला प्रशासन और विभिन्न आदिवासी एवं मूलनिवासी समाजों के प्रतिनिधियों की बैठक हुई।

बैठक में सर्व आदिवासी समाज की ओर से यह प्रस्ताव रखा गया कि कार्यक्रम की शुरुआत अमर शहीद वीर गुंडाधुर की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि से की जाए और कार्यक्रम का समापन प्रतापगंज पारा स्थित विवादित स्थल पर पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान एवं सभा के साथ किया जाए।

प्रशासन ने विवादित जमीन पर कार्यक्रम की अनुमति देने से किया इनकार

प्रशासन की ओर से यह कहते हुए अनुमति देने से इनकार किया गया कि संबंधित जमीन विवादित है और मामला न्यायालय में विचाराधीन है।

प्रशासन ने समाज के प्रतिनिधियों से किसी वैकल्पिक स्थान पर कार्यक्रम आयोजित करने अथवा समापन करने का आग्रह किया।

लेकिन समाज के प्रतिनिधि इस प्रस्ताव पर सहमत नहीं हुए।

इसके बाद बैठक में गतिरोध पैदा हो गया और समाज के प्रतिनिधियों की ओर से बैठक का बहिष्कार किया गया।


अपर कलेक्टर सी.पी. बघेल को लेकर भी नाराजगी


समाज के प्रतिनिधियों ने बैठक के दौरान अपर कलेक्टर सी.पी. बघेल की भूमिका को लेकर भी नाराजगी जताई थी।

समाज का आरोप है कि प्रतापगंज पारा स्थित देवस्थल पर पूजा-अर्चना और कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी गई।

समाज की ओर से यह भी प्रस्ताव रखा गया कि यदि पूरी भीड़ के साथ कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी जा सकती तो सीमित संख्या में प्रतिनिधियों को पारंपरिक पूजा-अर्चना की अनुमति दी जाए, लेकिन इस पर भी सहमति नहीं बन सकी।

आदिवासी समाज का कहना है कि उनकी मांग किसी विवादित जमीन पर कब्जा करने की नहीं, बल्कि अपनी परंपरागत धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधि को जारी रखने की है।


पिछले वर्ष की परंपरा का भी हवाला

समाज के नेताओं का कहना है कि पूर्व में विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर प्रतापगंज पारा स्थित स्थल पर पारंपरिक कार्यक्रम और पूजा-अर्चना की गई थी।

इसी परंपरा को इस वर्ष भी जारी रखने की मांग की जा रही थी।

प्रशासन का पक्ष यह है कि जमीन को लेकर विवाद न्यायालय में लंबित है, इसलिए वहां किसी नए कार्यक्रम की अनुमति देना उचित नहीं है।

यहीं से प्रशासन और आदिवासी समाज के बीच मतभेद और गहरा गया है।


विवादित जमीन पर पारंपरिक अनुष्ठान और पशु बलि


आंदोलन के दौरान सर्व आदिवासी समाज के एक वर्ग की ओर से प्रतापगंज पारा स्थित जमीन पर पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान किए जाने और पशु बलि दिए जाने की बात भी सामने आई।

समाज ने इसे अपनी पारंपरिक आस्था और अधिकार से जोड़ते हुए जमीन के आवंटन को निरस्त करने की मांग दोहराई।

इस घटनाक्रम के बाद विवाद का सामाजिक और धार्मिक पक्ष और अधिक संवेदनशील हो गया।


आदिवासी समाज की मांगें क्या हैं?


सर्व आदिवासी समाज और आंदोलन से जुड़े संगठनों की प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं—

पहली— जैन मंदिर निर्माण के लिए किए गए भूमि आवंटन को निरस्त किया जाए।

दूसरी— प्रतापगंज पारा की शासकीय जमीन को आदिवासी समाज एवं व्यापक सार्वजनिक हित के लिए सुरक्षित रखा जाए।

तीसरी— जमीन का उपयोग बस्तर दशहरा, पारंपरिक धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों और सामुदायिक गतिविधियों के लिए किया जाए।

चौथी— बस्तर दशहरा में शामिल होने वाले नाइक, पाईक, मांझी, मुखिया, रथ निर्माण से जुड़े कारीगरों तथा ओडिशा और महाराष्ट्र से आने वाले देवधामियों के लिए सर्वसुविधायुक्त बहुमंजिला भवन बनाया जाए।

पांचवीं— भूमि आवंटन, उसके बाद की कार्यवाही और रजिस्ट्री/डीड की पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कर सभी संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं।

छठी— सार्वजनिक पार्किंग की आवश्यकता को देखते हुए जमीन के जनहितकारी उपयोग पर पुनर्विचार किया जाए।

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने क्या मांगा है?

हाईकोर्ट में दाखिल रीज्वाइंडर के अंतिम हिस्से में याचिकाकर्ताओं ने प्रतिवादियों द्वारा दाखिल जवाब को खारिज करने और मूल याचिका में मांगी गई राहत प्रदान करने का अनुरोध किया है।

रीज्वाइंडर के अनुसार याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह है कि यदि पूरी राजस्व प्रक्रिया ही कानून और संविधान के विपरीत है तो उसके आधार पर बाद में किए गए आवंटन और डीड भी टिक नहीं सकते।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा है कि 10 फरवरी 2026 के आवंटन आदेश और 12 फरवरी 2026 की डीड मूल राजस्व प्रक्रिया के बाद की परिणामी कार्यवाही हैं।

सरकार और संबंधित पक्षों के जवाब पर याचिकाकर्ताओं का पलटवार

पूरे रीज्वाइंडर की खास बात यह है कि याचिकाकर्ताओं ने प्रतिवादियों द्वारा उठाए गए लगभग हर प्रमुख सवाल का जवाब देने की कोशिश की है।

लोस स्टैंडी यानी याचिका दायर करने के अधिकार पर उठाई गई आपत्ति को याचिकाकर्ताओं ने खारिज किया है।

उनका कहना है कि वे स्थानीय नागरिक हैं और शहर की सार्वजनिक जमीन, पार्किंग व्यवस्था तथा सार्वजनिक सुविधाओं से सीधे प्रभावित होते हैं।

इसी आधार पर उन्होंने पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन का भी हवाला दिया है और कहा है कि सरकार सार्वजनिक संपत्ति की संरक्षक है, न कि किसी निजी संस्था को लाभ पहुंचाने वाली संस्था।


“पुराने आवंटन गलत थे तो नया आवंटन सही नहीं हो जाता”


रीज्वाइंडर में एक और महत्वपूर्ण तर्क यह दिया गया है कि यदि अतीत में इसी प्रकार के अन्य आवंटन हुए भी हैं तो उससे वर्तमान आवंटन स्वतः वैध नहीं हो जाता।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि वर्तमान प्रक्रिया में कानून, संवैधानिक प्रावधानों या निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है तो केवल यह कहकर उसे सही नहीं ठहराया जा सकता कि पहले भी ऐसी कार्यवाहियां होती रही हैं।


अब असली सवाल—सरकारी जमीन का उपयोग किसके लिए?


पूरे विवाद को देखें तो मामला केवल दिगंबर जैन मंदिर बनाम आदिवासी समाज का बनाकर देखना शायद इस विवाद की पूरी तस्वीर नहीं बताता।

एक पक्ष का कहना है कि धार्मिक आस्था से जुड़ी जरूरत के लिए जमीन आवंटित की गई है, जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि यह शासकीय और सार्वजनिक संपत्ति है, जिसका उपयोग पूरे शहर की जरूरत के हिसाब से होना चाहिए।

इसके साथ ही मामला अनुसूचित क्षेत्र, पांचवीं अनुसूची, सार्वजनिक पार्किंग, राजस्व नियम, नगर निगम की वैधानिक प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों से भी जुड़ गया है।

यही वजह है कि अब इस जमीन को लेकर चल रहा विवाद सामाजिक तनाव से आगे बढ़कर कानूनी और संवैधानिक बहस का रूप ले चुका है।


सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम—2022 में जिस जमीन का आवंटन खारिज हुआ, उसी जमीन पर 2026 में आवंटन कैसे हुआ?

इस पूरे मामले में याचिकाकर्ताओं के रीज्वाइंडर से सबसे बड़ा सवाल यही उभरकर सामने आता है।


यदि 18 नवंबर 2022 को संबंधित जमीन के आवंटन का आवेदन राजस्व पुस्तक परिपत्र के प्रावधानों और जमीन की स्थिति के आधार पर खारिज किया गया था, तो बाद में उसी जमीन के संबंध में नई प्रक्रिया शुरू करने के लिए क्या बदला?


यदि जमीन वास्तव में लोक निर्माण विभाग के नाम दर्ज थी और मौजूदा जैन मंदिर से 400 मीटर के दायरे में होने के कारण पूर्व में आपत्ति दर्ज हुई थी, तो बाद की प्रक्रिया में इन तथ्यों पर क्या विचार किया गया?

यदि जमीन पर जिला प्रशासन स्वयं 15 दिन का सफल पार्किंग ट्रायल कर चुका था, तो बाद में पार्किंग की व्यवहारिकता पर सवाल क्यों उठे?

और यदि नगर निगम में वर्षों पहले सार्वजनिक बहुमंजिला पार्किंग के प्रस्ताव सामने आ चुके थे, तो उस सार्वजनिक आवश्यकता का क्या हुआ?

इन तमाम सवालों का अंतिम उत्तर अब दस्तावेजों, राजस्व रिकॉर्ड और न्यायालय की सुनवाई से सामने आएगा।


विश्व आदिवासी दिवस से पहले बढ़ी सियासी गर्मी


प्रतापगंज पारा की जमीन का विवाद ऐसे समय और अधिक संवेदनशील हो गया है, जब 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस के आयोजन को लेकर पूरे बस्तर में आदिवासी समाज की सक्रियता बढ़ी हुई थी।

एक तरफ जमीन को लेकर हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई चल रही है, दूसरी तरफ समाज सड़क पर आंदोलन कर रहा है और तीसरी तरफ प्रशासन कानून-व्यवस्था तथा न्यायालय में मामला लंबित होने का हवाला देकर विवादित स्थल पर कार्यक्रम की अनुमति देने से बचता रहा।

ऐसे में यदि समय रहते सभी पक्षों के बीच संवाद और कानूनी स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास नहीं हुआ तो यह विवाद आने वाले दिनों में जगदलपुर से निकलकर पूरे बस्तर की सामाजिक और राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन सकता है।




हाईकोर्ट में अभी याचिकाकर्ताओं का रीज्वाइंडर दाखिल हुआ है। उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर इसे हाईकोर्ट का अंतिम फैसला नहीं कहा जा सकता। रीज्वाइंडर में लगाए गए आरोप और कानूनी तर्क याचिकाकर्ताओं का पक्ष हैं। संबंधित प्रतिवादियों का पक्ष और अंततः न्यायालय का निर्णय अलग से महत्वपूर्ण होगा।




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