ब्रिटेन ने भी लगाया अंडर-16 सोशल मीडिया बैन, लेकिन क्या यह वास्तव में कारगर है?
ऑस्ट्रेलिया से ब्रिटेन तक बच्चों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध की लहर, नतीजों पर दुनिया की नजर
नई दिल्ली/जगदलपुर/ बच्चों और किशोरों पर सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन शोषण और डिजिटल लत को देखते हुए दुनिया के कई देश सोशल मीडिया उपयोग पर सख्त प्रतिबंध लगाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसी कड़ी में यूनाइटेड किंगडम (यूके) ने भी 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। ब्रिटिश सरकार का कहना है कि यह कदम बच्चों को "उनका बचपन वापस देने" और उन्हें ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए उठाया जा रहा है।
प्रतीकात्मक तस्वीर
यूके सरकार के प्रस्ताव के अनुसार टिकटॉक, इंस्टाग्राम, फेसबुक, एक्स (पूर्व में ट्विटर), स्नैपचैट और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अपनी सेवाएं उपलब्ध नहीं करा सकेंगे। हालांकि व्हाट्सएप और सिग्नल जैसे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म इस प्रतिबंध के दायरे से बाहर रखे गए हैं। सरकार की योजना है कि यह व्यवस्था 2027 तक पूरी तरह लागू कर दी जाए।
सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने उठाया था बड़ा कदम
दुनिया में सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर व्यापक प्रतिबंध लागू किया। दिसंबर 2025 से लागू इस कानून के तहत फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब, स्नैपचैट, रेडिट, एक्स, ट्विच और अन्य प्लेटफॉर्मों को नाबालिगों के खाते हटाने और नए खाते बनने से रोकने की जिम्मेदारी दी गई। नियमों का पालन न करने पर कंपनियों पर करोड़ों डॉलर का जुर्माना लगाया जा सकता है।
क्या ऑस्ट्रेलिया में प्रतिबंध सफल रहा?
यही वह प्रश्न है जिस पर दुनिया भर के नीति-निर्माता नजर रखे हुए हैं।
प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार लाखों सोशल मीडिया अकाउंट बंद किए गए और कई प्लेटफॉर्मों ने उम्र सत्यापन (Age Verification) की प्रक्रिया शुरू की। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अभी इसकी सफलता का अंतिम मूल्यांकन करना जल्दबाजी होगी।
दूसरी ओर कई रिपोर्टों में सामने आया कि बड़ी संख्या में किशोर फेस रिकग्निशन सिस्टम को चकमा देकर या अन्य तकनीकी उपायों का उपयोग कर प्रतिबंधों को पार करने में सफल रहे। कुछ बच्चों ने उम्र सत्यापन प्रणाली को धोखा देकर पुनः सोशल मीडिया तक पहुंच बना ली।
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि प्रतिबंध के बाद कुछ किशोर कम नियंत्रित और अपेक्षाकृत अधिक जोखिम वाले प्लेटफॉर्मों की ओर स्थानांतरित हो गए, जहां निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था कमजोर है। इससे यह बहस और तेज हो गई कि क्या पूर्ण प्रतिबंध वास्तव में सबसे प्रभावी समाधान है।
फ्रांस ने अपनाया अलग मॉडल
फ्रांस ने पूर्ण प्रतिबंध की बजाय आयु सत्यापन और अभिभावकीय सहमति का मॉडल अपनाया। वहां 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग के लिए अभिभावकों की अनुमति आवश्यक मानी गई है। फ्रांसीसी सरकार का मानना है कि बच्चों को पूरी तरह डिजिटल दुनिया से अलग करने की बजाय नियंत्रित और सुरक्षित पहुंच देना अधिक व्यावहारिक उपाय है।
हालांकि फ्रांस में भी आयु सत्यापन की तकनीकी चुनौतियां और गोपनीयता संबंधी चिंताएं लगातार चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
कनाडा भी सख्ती की राह पर
कनाडा सरकार ने हाल ही में ऐसा विधेयक पेश किया है जिसके तहत 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। हालांकि इसमें एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह भी है कि यदि कोई सोशल मीडिया कंपनी यह साबित कर दे कि उसने बच्चों की सुरक्षा के पर्याप्त उपाय किए हैं तो उसे छूट दी जा सकती है।
कनाडा का दृष्टिकोण पूर्ण प्रतिबंध और सुरक्षित उपयोग के बीच संतुलन बनाने का प्रयास माना जा रहा है।
प्रतिबंधों के पक्ष में क्या तर्क हैं?
इन कानूनों के समर्थकों का कहना है कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग बच्चों और किशोरों में अवसाद, चिंता, आत्मसम्मान में कमी, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन शोषण और डिजिटल लत जैसी समस्याओं को बढ़ावा देता है।
ब्रिटेन में हुई सरकारी परामर्श प्रक्रिया में लगभग 90 प्रतिशत अभिभावकों ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध का समर्थन किया।
समर्थकों का मानना है कि सोशल मीडिया कंपनियों के एल्गोरिदम बच्चों (किसी काम को पूरा करने या समस्या को हल करने के लिए दिए गए चरण-दर-चरण निर्देशों,step-by-step instructions,का एक समूह )को लंबे समय तक स्क्रीन पर बनाए रखने के लिए डिजाइन किए जाते हैं, जिससे उनके मानसिक और सामाजिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
विरोधियों के तर्क भी कम मजबूत नहीं
दूसरी ओर अनेक तकनीकी विशेषज्ञ, शिक्षाविद और बाल अधिकार कार्यकर्ता पूर्ण प्रतिबंध के मॉडल पर सवाल उठा रहे हैं।
उनका कहना है कि प्रतिबंध से बच्चे पूरी तरह सोशल मीडिया से दूर नहीं होते, बल्कि वे वैकल्पिक और कम सुरक्षित प्लेटफॉर्मों की ओर चले जाते हैं। इसके अलावा कई शैक्षणिक, सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य सहायता समूहों तक उनकी पहुंच भी प्रभावित हो सकती है।
कुछ विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि समस्या का मूल कारण केवल बच्चों की पहुंच नहीं, बल्कि सोशल मीडिया कंपनियों के एल्गोरिदम, डेटा संग्रहण और कंटेंट वितरण की प्रणाली है। जब तक इन मूल कारणों पर कार्रवाई नहीं होगी, केवल आयु आधारित प्रतिबंध सीमित प्रभाव ही दिखा पाएंगे।
सबसे बड़ी चुनौती: उम्र की सही पहचान
दुनिया के लगभग सभी देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उम्र सत्यापन (Age Verification) है।
सरकारें फेस रिकग्निशन, डिजिटल पहचान पत्र और अन्य तकनीकों का उपयोग करना चाहती हैं, लेकिन इससे निजता (Privacy) और डेटा सुरक्षा को लेकर नए प्रश्न खड़े हो रहे हैं। साथ ही कई मामलों में बच्चे इन तकनीकों को चकमा देने में सफल भी पाए गए हैं।
निष्कर्ष
दुनिया भर में बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित करने की दिशा में एक नया वैश्विक रुझान उभर रहा है। ऑस्ट्रेलिया ने इसे लागू कर दिया है, ब्रिटेन ने व्यापक प्रतिबंध की घोषणा की है, कनाडा कानून ला रहा है और फ्रांस पहले से आयु-आधारित नियंत्रण लागू कर चुका है।
हालांकि अब तक उपलब्ध अनुभव यह संकेत देते हैं कि केवल प्रतिबंध लगाना पर्याप्त नहीं है। प्रभावी आयु सत्यापन, अभिभावकीय निगरानी, डिजिटल साक्षरता, सुरक्षित एल्गोरिदम और प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही जैसे उपायों को साथ लेकर चलना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ वर्षों में ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के अनुभव यह तय करेंगे कि सोशल मीडिया प्रतिबंध बच्चों की सुरक्षा का प्रभावी समाधान बन पाते हैं या नहीं।