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आशीष तिवारी

जाति पाति की दीवार गिराने के लिए मठ–मंदिरों को आगे आना होगा :धर्म स्तम्भ काउंसिल,सनातन कर्म पर आधारित है, जन्म पर नहीं, जाति प्रथा एक थोपी गई कुरीति है: डॉ सौरव निर्वाणी


मठ मंदिरों में होगा समरसता भोज का आयोजन:डॉ द्विवेदी

रायपुर।धर्म स्तंभ काउंसिल के तत्वावधान में आयोजित संवाद में मठ–मंदिरों की सामाजिक भूमिका पर बड़ा और ऐतिहासिक वक्तव्य सामने आया,धर्म स्तंभ काउंसिल के सभापति डॉ सौरव निर्वाणी एवं निर्वाणी अखाड़ा नर्मदा कुंड के महंत सुरेंद्र दास ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जाति–पाति की दीवारें तोड़ने का दायित्व अब केवल भाषणों का नहीं, बल्कि मठ–मंदिरों के प्रत्यक्ष आचरण का विषय है।

महंत सुरेंद्र दास ने कहा “समाज को दिशा मठ–मंदिर ही दे सकते हैं। यदि हमारे धर्मस्थल ही भेदभाव से मुक्त नहीं होंगे तो समाज कैसे बदलेगा?”उन्होंने बताया कि सनातन धर्म में वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी, जन्म पर नहीं,मनुस्मृति का स्पष्ट उद्घोष है

जन्मना जायते शूद्रः, संस्कारात् द्विज उच्यते’अर्थात मनुष्य जन्म से नहीं, कर्म और संस्कार से श्रेष्ठ बनता है।

धर्म स्तंभ काउंसिल के सभापति डॉ सौरव निर्वाणी ने कहा कि यदि सनातन में जाति व्यवस्था होती तो रामायण और महाभारत काल के स्वयंवरों में सभी वर्ग भाग नहीं ले सकते थे,ऋषि वाल्मीकि, जिन्हें रामायण का रचयिता माना जाता है,शिकार से साधना की ओर आए,राजा हरिश्चंद्र, निषादराज, कपिल ऋषि,व्यास,ऋषि अंगीकार शबरी माता, जैसे असंख्य उदाहरण बताते हैं कि भक्ति और धर्म में कोई ऊँच नीच नहीं,रानी सत्यवती जो मल्लाह समाज से थीं, अखंड भारत के शासन और नीति में प्रभावशाली भूमिका में रहीं,डॉ निर्वाणी ने जोर देकर कहा जाति प्रथा कोई सनातन परंपरा नहीं, बल्कि कुछ सौ वर्ष पहले थोपी गई एक विभाजनकारी विदेशी वामपंथी विचारधारा का परिणाम है, जिसका उद्देश्य भारत की पुण्यभूमि को तोड़ना था,दुर्भाग्य से आज भी हम उसी जाल में फंसे हैं।

मठ–मंदिर चुप नहीं बैठ सकते

अखिल भारतीय पुजारी पुरोहित संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष देवकुमार बालादास ने तीखे शब्दों में कहा—मठ–मंदिर, साधु समाज और सनातन के रक्षक इस सामाजिक अन्याय को मूकदर्शक बनकर नहीं देख सकते,जाति व्यवस्था ने इस राष्ट्र को अपार क्षति पहुँचाई है।”

इस वैचारिक आंदोलन को धरातल पर उतारते हुए रामजानकी मंदिर, निर्वाणी अखाड़ा, नर्मदा कुंड में एक ऐतिहासिक पहल की जा रही है।

यहाँ 11 ब्राह्मणों,क्षत्रियों,दलित और वैश्य भाइयों के साथ “समरसता भोज” का आयोजन किया जा रहा है यह भोज केवल भोजन नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का प्रतीक होगा।”

धर्म स्तंभ काउंसिल ने घोषणा की कि प्रदेशभर के सभी मठ–मंदिरों में ऐसे आयोजन हों ,इसके लिए संत समाज की बैठक के बाद धर्म स्तंभ काउंसिल द्वारा आधिकारिक एडवाइजरी जारी की जाएगी।

महंत सुरेंद्र दास ने स्मरण कराया कि स्वयं राम रामानंदाचार्य जी का संदेश कि जाति–पांति पूछे नहीं कोई, हरी को भजै सो हरी का होई।”

यही सनातन है, यही भारत की आत्मा है ,जो राम के हैं, जो कृष्ण के हैं वे सभी समान हैं

डॉ सौरव निर्वाणी ने उल्लिखित किया जाति–पांति एक ढोंग है, एक कुरीति है, सनातनी व्यवस्था नहीं है अब इससे मुक्ति का समय आ गया है,मठ–मंदिरों से इसकी विदाई होगी और समाज से इसके खात्मे की शुरुआत होगी,उन्होंने इसे एक नया सामाजिक स्वतंत्रता आंदोलन बताते हुए कहा यह आज़ादी की दूसरी लड़ाई है सामाजिक गुलामी से मुक्ति की लड़ाई, जिसकी अगुवाई हम सबको मिलकर करनी है।

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