शिक्षा जगत में मानसिक स्वास्थ्य की नई पहल: दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ने शैक्षणिक संस्थानों को दिया संवेदनशील और सशक्त भविष्य का संदेश.....
रायपुर। युवाओं में बढ़ते तनाव, अवसाद और बदलती जीवनशैली के प्रभावों पर गंभीर शैक्षणिक विमर्श को केंद्र में रखते हुए शासकीय जे. योगानंदम छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर एवं शासकीय चंदूलाल चंद्राकर महाविद्यालय, धमधा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण” का प्रथम दिवस उत्साह, शोध और सकारात्मक संवाद के वातावरण में संपन्न हुआ। यह आयोजन शैक्षणिक संस्थानों में मानसिक सशक्तता को पाठ्यक्रम और परिसर संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बनाने की दिशा में एक मजबूत पहल के रूप में सामने आया।
कार्यक्रम का शुभारंभ सरस्वती वंदना और राजगीत से हुआ। उद्घाटन सत्र में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ अकादमिक विचारों का संगम देखने को मिला, जहां कु. नम्रता गुप्ता, श्रेया चक्रवर्ती और शांतनु चटर्जी की भजन एवं गीत प्रस्तुतियों ने वातावरण को प्रेरणादायक ऊर्जा से भर दिया।
मुख्य अतिथि डॉ. एस. के. पटले, राज्य नोडल अधिकारी (मानसिक स्वास्थ्य) एवं संयुक्त संचालक, उच्च शिक्षा विभाग, छत्तीसगढ़ शासन ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि शैक्षणिक गुणवत्ता और सामाजिक प्रगति का आधार है। उन्होंने कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को युवाओं की मानसिक मजबूती का सबसे प्रभावी मंच बताते हुए कहा कि ऐसे राष्ट्रीय मंच व्यवहारिक समाधान और जागरूकता को नई दिशा देते हैं।
विशिष्ट अतिथि डॉ. जे. सी. अजवानी, प्रख्यात मनोवैज्ञानिक ने प्रतिस्पर्धात्मक युग में युवाओं में बढ़ती चिंता और आत्म-संदेह पर चिंता जताते हुए खुली संवाद संस्कृति को समय की मांग बताया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. तपेश चंद्र गुप्ता, प्राचार्य, शासकीय जे. योगानंदम छत्तीसगढ़ महाविद्यालय ने बताया कि प्रदेश के करीब 120 महाविद्यालयों से 400 प्रतिभागियों की भागीदारी इस आयोजन की शैक्षणिक गंभीरता और व्यापक प्रभाव को दर्शाती है। सह-अध्यक्ष डॉ. उषाकिरण अग्रवाल, प्राचार्या, शासकीय चंदूलाल चंद्राकर महाविद्यालय, धमधा ने मानसिक सशक्तता को जीवन की चुनौतियों से जूझने का मूल आधार बताया।
वैज्ञानिक सत्र में शोधार्थियों ने तनाव प्रबंधन, सकारात्मक सोच और मानसिक कल्याण पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। पैनल चर्चा की अध्यक्षता डॉ. अरुणा ओझा ने की, जहां शिक्षकों और विद्यार्थियों दोनों के लिए योग, ध्यान, संतुलित जीवनशैली और संवेदनशील शैक्षणिक वातावरण को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।
संगोष्ठी का निष्कर्ष स्पष्ट रहा—मानसिक रूप से स्वस्थ शैक्षणिक परिसर न केवल शैक्षणिक उपलब्धियों को बढ़ाते हैं, बल्कि आत्मविश्वास, सकारात्मक संबंधों और संतुलित व्यक्तित्व के निर्माण में भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। दूसरे दिन 4 फरवरी को होने वाले अकादमिक और संवादात्मक सत्रों से यह पहल और अधिक व्यापक प्रभाव छोड़ने की ओर अग्रसर है।
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