“एक आवाज़, जिसने हिला दी सरकार” विकास तिवारी के दबाव में टूटी शिक्षा माफियाओं की पकड़, DEO के हाथों में आई परीक्षाओं की कमान....
आशीष विनय तिवारी उप-संपादक Thewatchmannews.in.रायपुर(छ.ग.)
रायपुर।छत्तीसगढ़ की शिक्षा राजनीति में जिस फैसले ने निजी स्कूल माफियाओं की नींद उड़ा दी, उसके पीछे पिछले तीन वर्षों से लगातार संघर्ष कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता और जनसेवक विकास तिवारी की निर्णायक भूमिका मानी जा रही है। सत्र 2026-27 से कक्षा 1, 2, 3, 4, 6, 7, 9 और 11वीं की वार्षिक परीक्षाएं सीधे जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) द्वारा कराए जाने के आदेश को राजनीतिक गलियारों में “जनआंदोलन की जीत” बताया जा रहा है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के निर्देश पर जारी इस आदेश को शिक्षा व्यवस्था में बड़ा प्रशासनिक सुधार माना जा रहा है, लेकिन इसके पीछे विकास तिवारी की सतत मुहिम, ज्ञापनों, जनसुनवाइयों और लगातार मीडिया के माध्यम से उठाई गई आवाज़ को अहम माना जा रहा है।
तीन साल का संघर्ष, एक बड़ा फैसला:
विकास तिवारी ने प्रदेशभर में कथित फर्जी CBSE स्कूलों और निजी स्कूल संचालकों की मनमानी के खिलाफ मोर्चा खोला। उन्होंने आरोप लगाया कि कई स्कूल CGBSE की मान्यता के बावजूद CBSE का नाम इस्तेमाल कर अभिभावकों को भ्रमित कर रहे हैं, फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी कर रहे हैं और परीक्षा परिणामों पर प्रभाव डाल रहे हैं।
उनकी लगातार शिकायतों और दस्तावेज़ी प्रस्तुतियों के बाद यह मुद्दा प्रशासन से होते हुए सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा।
राजनीतिक दबाव बना निर्णायक हथियार:
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विकास तिवारी ने इस मुद्दे को सिर्फ सामाजिक आंदोलन नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडा बना दिया। उन्होंने इसे “बच्चों के भविष्य और अभिभावकों के अधिकारों की लड़ाई” के रूप में पेश कर सरकार पर नैतिक और जनदबाव दोनों बनाया।
विकास तिवारी का कहना है—
“यह मेरी नहीं, प्रदेश के लाखों बच्चों की जीत है। सरकार ने आखिरकार शिक्षा माफियाओं के खिलाफ कदम उठाया है। यह फैसला साबित करता है कि जनता की आवाज़ सत्ता से बड़ी होती है।”
सरकार से लेकर विपक्ष तक हलचल:
इस फैसले के बाद सत्तापक्ष ने इसे पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में बड़ा कदम बताया है, वहीं विपक्ष इसे शिक्षा व्यवस्था में वर्षों से चले आ रहे अव्यवस्थाओं की स्वीकारोक्ति करार दे रहा है।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि विकास तिवारी ने इस मुद्दे पर जिस तरह जनसमर्थन खड़ा किया, उसने सरकार को ठोस कार्रवाई के लिए मजबूर कर दिया।
“लड़ाई अभी खत्म नहीं”:
विकास तिवारी ने साफ किया कि यह सिर्फ शुरुआत है, “आज परीक्षाओं पर सरकारी नियंत्रण आया है, कल फीस, मान्यता और स्कूलों की जवाबदेही पर भी सख्त फैसले होंगे। जब तक शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी नहीं हो जाती, यह आंदोलन रुकेगा नहीं।”
प्रदेशव्यापी समर्थन:
अभिभावक संगठनों और छात्र समूहों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए विकास तिवारी को “बच्चों की आवाज़” बताया है। कई जिलों में उनके समर्थन में बैठकें और संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिससे यह मुद्दा अब सामाजिक से आगे बढ़कर राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनता जा रहा है।
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