जिन आदिवासियों की आस्था से सजता है ऐतिहासिक दशहरा, आज उन्हीं के सम्मान का 80 लाख के ‘मीना बाजार’ में हो रहा सौदा—राजपरिवार, सांसद, मंत्री, विधायक और अफसर सब बने मूकदर्शक!”
जगदलपुर/युवा नेता आदित्य सिंह बिसेन ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए बस्तर के ऐतिहासिक एवं विश्वप्रसिद्ध दशहरे की व्यवस्थाओं को लेकर प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और राजपरिवार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा केवल एक शासकीय उत्सव नहीं, बल्कि यहां की माटी, आदिवासी आस्था, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा 75 दिनों का ऐतिहासिक महापर्व है। ऐसे में दशहरे में दूर-दराज के गांवों से आने वाले आदिवासी समाज के लोगों की सुविधाओं और सम्मान की अनदेखी किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जा सकती।
आदित्य सिंह बिसेन ने बस्तर के विश्वप्रसिद्ध और ऐतिहासिक दशहरे की प्रथम रस्म ‘पाट जात्रा’ के पावन अवसर पर समस्त बस्तरवासियों तथा अंचल के दूर-दराज गांवों से आने वाले हमारे आदिवासी भाई-बहनों को हार्दिक शुभकामनाएं दी हैं
उन्होंने कहा बस्तर दशहरा केवल एक शासकीय उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमारी माटी की आस्था, संस्कृति और यहां के मूल निवासियों की प्राणवायु है। लेकिन यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और हृदयविदारक है कि जिस आदिवासी समुदाय के खून-पसीने और अटूट आस्था के बिना 75 दिनों के इस महाकुंभ की कल्पना भी नहीं की जा सकती, आज उसी समुदाय को व्यवस्थापकों, सत्ताधीशों और राजपरिवार की कथित अनदेखी के चलते दर-दर भटकने के लिए सड़क पर छोड़ दिया गया है।
विकास के नाम पर छिन गए पारंपरिक आश्रय स्थल
पूर्व के वर्षों में अंचल से आने वाले ग्रामीणों के विश्राम हेतु बस्तर हाई स्कूल, राष्ट्रीय विद्यालय, सदर स्कूल और पुराना पीडब्ल्यूडी कार्यालय (वर्तमान बस्तर आर्ट गैलरी) जैसे स्थानों पर मुकम्मल व्यवस्था होती थी। परंतु आज प्रशासन ने इन स्थलों का पूरी तरह व्यवसायीकरण कर दिया है।
पूर्व के आश्रय स्थल तहसील कार्यालय को ‘बियांड टैंपटेशन’ नामक निजी संस्था को सौंपकर संस्कृति के नाम पर कैफे संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है। वहीं, जो ‘आदिवासी भवन’ सीधे तौर पर आदिवासियों के हक का था, वह वर्षों से प्रशासन की कथित अकर्मण्यता के चलते निर्माणाधीन पड़ा धूल फांक रहा है।
बस्तर संभाग के समस्त जनप्रतिनिधि विश्व आदिवासी दिवस पर सज-धजकर फोटो खिंचवाते हैं, फ्लेक्स लगवाते हैं, लेकिन जब आदिवासियों के लिए भवन निर्माण के फंड की व्यवस्था करने की बात आती है तो कोई पहल करना नहीं चाहता।
मीलों पैदल चलकर बस्तर दशहरे की रस्में निभाने वाले हमारे आदिवासी भाई-बहन आखिर कहां ठहरेंगे? क्या प्रशासन, नेता और राजपरिवार चाहते हैं कि वे निजी कैफे के बाहर या मीना बाजार के तंबुओं के पीछे सड़कों पर रात गुजारें?
आस्था से बड़ा हुआ 80 लाख का मुनाफा?
जिस ऐतिहासिक दशहरे की नींव आदिवासी आस्था और राजपरिवार के संबंधों पर टिकी है, आज उसी राजपरिवार की कथित व्यावसायिक सोच ने बस्तर को शर्मसार किया है।
जिन भोले-भाले आदिवासियों के असीम सम्मान और निस्वार्थ सेवा से राजपरिवार का सदियों पुराना गौरव आज भी जीवित है, उनके रुकने के लिए राजमहल परिसर में जगह देने के बजाय उस पावन भूमि को 70 से 80 लाख रुपये के भारी-भरकम किराये के लिए ‘मीना बाजार’ यानी ‘डिज्नी लैंड’ के संचालकों को सौंपे जाने पर सवाल उठ रहे हैं।
आदिवासियों की पीढ़ियों की आस्था को मुनाफे की वेदी पर चढ़ा देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। यह बस्तर की संस्कृति और यहां के मूल निवासियों के सम्मान से जुड़ा गंभीर विषय है।
सांसद, मंत्री, विधायक और अफसरों का शर्मनाक मौन
यह बस्तर की सबसे बड़ी विडंबना है कि यहां का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे सांसद, मंत्री और विधायक, जो इसी आदिवासी समाज के वोटों से सत्ता तक पहुंचे हैं, आज पूरी तरह मौन हैं।
चुनाव के समय यही नेता आदिवासियों के सबसे बड़े रहनुमा होने का दावा करते हैं, लेकिन सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही अपनी प्राथमिकता भूल जाते हैं।
क्या हमारे मंत्रियों और विधायकों का काम केवल ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा देना और अपनी जेबें भरना रह गया है? बस्तर के आदिवासियों के हक में आवाज उठाने के लिए इनके मुंह क्यों सिल गए हैं?
जिले के बड़े प्रशासनिक अधिकारी केवल वातानुकूलित कमरों में बैठकर कागजी बैठकों और ‘फोटो-ऑप’ की औपचारिकता निभा रहे हैं। धरातल पर आदिवासियों के लिए कोई ठोस व्यवस्था दिखाई नहीं दे रही है।
तत्काल और सम्मानजनक व्यवस्था की मांग
आदित्य सिंह बिसेन ने कहा कि हम बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष, जिले के आला अधिकारियों, स्थानीय विधायकों, मंत्रियों, सांसद और राजपरिवार से दृढ़तापूर्वक मांग करते हैं—
1. तत्काल और सम्मानजनक व्यवस्था:
दशहरा में आने वाले सभी ग्रामीणों के लिए समय रहते सुरक्षित, व्यवस्थित और पूर्णतः निःशुल्क ठहरने की सम्मानजनक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
2. परंपराओं का बाजारीकरण बंद हो:
राजमहल परिसर और अन्य पारंपरिक स्थलों को व्यावसायिक मुनाफे, मीना बाजार आदि के लिए इस्तेमाल करने के बजाय बस्तर के मूल निवासियों की सुविधा के लिए प्राथमिकता के आधार पर आरक्षित किया जाए।
बस्तर की असली पहचान उसकी आदिवासी संस्कृति, परंपरा और आस्था से है, मीना बाजार के शोर और कैफे की चमक से नहीं।
बिसेन ने कह कि आदिवासियों के लिए उचित व्यवस्था करना केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि इस माटी का कर्ज है। जिस आदिवासी समाज की आस्था, परंपरा और सहभागिता से बस्तर दशहरा सदियों से जीवित है, उसके सम्मान और सुविधाओं के साथ किसी भी प्रकार की अनदेखी स्वीकार नहीं की जा सकती।
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