पुलिसकर्मियों के वेतन से बिना सहमति कटौती पर हाईकोर्ट सख्त,उज्जवल दीवान की याचिका पर अहम आदेश, अभ्यावेदन पर 60 दिन में कानून के मुताबिक फैसला करने के निर्देश...
बिलासपुर। पुलिस कर्मचारियों के वेतन से उनकी सहमति के बिना की जा रही विशेष कटौती के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। वर्ष 2020 में याचिकाकर्ता उज्जवल दीवान एवं अन्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संजय के.अग्रवाल की एकल पीठ ने संबंधित प्राधिकारी को अभ्यावेदन पर निर्धारित समय-सीमा में निर्णय लेने का निर्देश दिया है।
याचिका की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ने न्यायालय के समक्ष पक्ष रखते हुए बताया कि पुलिस कर्मचारियों के वेतन से की जा रही विशेष कटौती को लेकर संबंधित प्राधिकारी के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत किया गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि कर्मचारियों की सहमति के बिना वेतन से की जा रही कटौती के संबंध में लंबे समय से अभ्यावेदन लंबित है, लेकिन उस पर अब तक कोई निर्णय नहीं लिया गया।
60 दिन में लेना होगा फैसला:
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने संबंधित उत्तरदाता प्राधिकारी को निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ताओं के अभ्यावेदन पर अब तक विचार नहीं किया गया है, तो न्यायालय के आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से 60 दिनों के भीतर अभ्यावेदन पर कानून के अनुसार तथा उसके गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिया जाए।
हालांकि, न्यायालय ने इस स्तर पर वेतन कटौती के विवाद के मूल गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की। कोर्ट ने संबंधित प्राधिकारी को ही अभ्यावेदन पर नियमानुसार निर्णय लेने का निर्देश देते हुए याचिका का अंतिम रूप से निपटारा कर दिया।
लंबे समय से उठ रहा था वेतन कटौती का मुद्दा:
पुलिस कर्मचारियों के वेतन से होने वाली कथित विशेष कटौती को लेकर उठे इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खास तौर पर इसलिए कि न्यायालय ने संबंधित प्राधिकारी को मामले को अनिश्चितकाल तक लंबित रखने के बजाय 60 दिनों की समय-सीमा में निर्णय लेने का निर्देश दिया है।
अब निगाहें संबंधित विभागीय प्राधिकारी के निर्णय पर टिकी हैं। यदि अभ्यावेदन पर पहले से निर्णय नहीं हुआ है, तो हाईकोर्ट के निर्देश के अनुरूप निर्धारित समय में कानून और मामले के तथ्यों के आधार पर फैसला करना होगा।
फिलहाल हाईकोर्ट ने वेतन कटौती को सही या गलत घोषित नहीं किया है, बल्कि अभ्यावेदन पर नियमानुसार निर्णय लेने का रास्ता स्पष्ट किया है।
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