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आशीष तिवारी

मृतों के नाम पर ज़मीन की हेराफेरी! तहसीलदार की शह पर राजस्व दालाली का बड़ा खुलासा, करोड़ों के घोटाले की आशंका.....

रायपुर/अभनपुर। राजस्व विभाग में व्याप्त कथित भ्रष्टाचार और संगठित भूमि दालाली का एक और चौंकाने वाला मामला ग्राम टेकाड़ी, पटवारी हल्का क्रमांक–3, उप तहसील खोरपा, अनुविभागीय अधिकारी अभनपुर के अंतर्गत सामने आया है। आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर मृत वसीयतदाता और मृत वसीयत प्राप्तकर्ता के आधार पर ज़मीन का नामांतरण कर दिया गया, जिससे करोड़ों रुपये के अवैध लेन–देन की आशंका जताई जा रही है।

यह पूरा मामला राजस्व प्रकरण क्रमांक 202510116300040 / अ / 6 / वर्ष 2025–26 से जुड़ा है। विवादित भूमि खसरा नंबर 323/1 है, जो पहले शारदा वर्मा एवं बोधिनी (पति – स्व. सरजू वर्मा) के संयुक्त नाम पर दर्ज थी।

कैसे हुआ पूरा खेल

सूत्रों के अनुसार—

शारदा वर्मा का निधन 23 अप्रैल 2021 को हो चुका है।

वसीयत प्राप्तकर्ता गुलाब वर्मा का निधन वर्ष 2024 में हो चुका है।

दोनों के मृत्यु प्रमाण-पत्र राजस्व रिकॉर्ड में संलग्न हैं।

इसके बावजूद आरोप है कि राजस्व अभिलेखों में मृत व्यक्तियों के नाम जानबूझकर कॉलम में बनाए रखे गए, ताकि यह आभास दिया जा सके कि खातेदार जीवित हैं। इसी तकनीकी भ्रम के आधार पर तहसीलदार द्वारा आदेश पारित कर भूमि को वसीयतदाता एवं वसीयत प्राप्तकर्ता के पुत्रों के नाम पर चढ़ा दिया गया।

नियमों की खुली अवहेलना

कानून के अनुसार, जब वसीयतदाता और वसीयत प्राप्तकर्ता दोनों मृत हों, तो वसीयत स्वतः अमान्य (Void) हो जाती है और ऐसे मामलों में उत्तराधिकार कानून लागू होता है। इसके बावजूद आरोप है कि—

मृत्यु प्रमाण संलग्न होने के बाद भी

कानूनी परीक्षण किए बिना

सुनियोजित ढंग से नामांतरण आदेश पारित कर दिया गया।

अवैध कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल

मामले में एक और गंभीर आरोप सामने आया है कि तहसील कार्यालय में बाहरी और अवैध व्यक्तियों से राजस्व कार्य कराया जा रहा है।

ये लोग—

सरकारी कर्मचारी नहीं हैं,

उनकी कोई वैधानिक नियुक्ति नहीं है,

फिर भी फाइल तैयार करने, प्रविष्टि कराने, नामांतरण और आदेशों की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

आरोप है कि तहसीलदार की जानकारी और संरक्षण में यह पूरा नेटवर्क काम कर रहा है, जिससे कार्यालय को “निजी दफ्तर” की तरह चलाया जा रहा है।

करोड़ों के घोटाले की आशंका

नामांतरण के बाद भूमि का आगे क्रय–विक्रय किए जाने की बात सामने आई है, जिससे बड़े आर्थिक घोटाले की आशंका जताई जा रही है। बिना राजस्व अधिकारियों, अवैध कर्मचारियों और कथित दलालों की मिलीभगत के इस स्तर पर हेराफेरी संभव नहीं मानी जा रही।

उठ रहे हैं तीखे सवाल?

तहसील कार्यालय में अवैध कर्मचारियों को बैठाने का आदेश किसका है?

क्या इसी तरीके से अन्य भूमि मामलों में भी नामांतरण कराए गए?

जब मृत्यु प्रमाण-पत्र संलग्न थे, तब नामांतरण क्यों किया गया?

कितनी ज़मीनें इस तरह “संरक्षण” में हड़पी गईं?

जिम्मेदारी तय करने की मांग

आरोपकर्ताओं का कहना है कि यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित राजस्व अपराध का उदाहरण है।

प्रमुख मांगें

विवादित नामांतरण आदेश को तत्काल निरस्त किया जाए।

तहसील कार्यालय से सभी अवैध/बाहरी कर्मचारियों को हटाया जाए।

मामले की EOW/ACB से निष्पक्ष जांच कराई जाए।

संबंधित तहसीलदार, अवैध कर्मचारियों और लाभार्थियों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए।

अवैध रूप से हुए सभी भूमि लेन–देन को शून्य घोषित किया जाए।

यह मामला न सिर्फ एक ज़मीन या परिवार से जुड़ा बताया जा रहा है, बल्कि इसे राजस्व विभाग में फैले उस नेटवर्क का प्रतीक माना जा रहा है, जो आम जनता की ज़मीन को कथित रूप से “माल” बनाने में लगा है।

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