दिल्ली में लोकतांत्रिक अधिकारों पर पहरा, सुप्रीम कोर्ट ज्ञानेश कुमार के मामले में संज्ञान ले:इन्तेखाब आलम
मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदी, ट्रेनों के रद्द होने और भारी पुलिस बंदोबस्त के बावजूद विरोध की आवाज नहीं थमी; निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर उठ रहे सवालों की न्यायिक समीक्षा जरूरी
दिल्ली।अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के सदस्य एवं सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता इन्तेखाब आलम ने शनिवार को दिल्ली में विपक्षी दलों और विभिन्न संगठनों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान लागू की गई व्यापक पाबंदियों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की नीतियों और संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज के खिलाफ आवाज उठाना नागरिकों का अधिकार है। इस अधिकार के इस्तेमाल को कठिन बनाने वाली परिस्थितियां लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय हैं।
इन्तेखाब आलम ने कहा कि दिल्ली में भारी पुलिस बल की तैनाती, बैरिकेडिंग, मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश एवं निकास द्वारों पर पाबंदियों और रेल सेवाओं में व्यवधान की खबरें सामने आई हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 10 अक्टूबर को नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों पर निर्धारित अवधि के लिए रेल सेवाएं प्रभावित हुईं तथा कई मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद किए गए। इससे आम यात्रियों और दिल्ली पहुंचने की कोशिश कर रहे लोगों को परेशानी हुई।
उन्होंने कहा कि यदि किसी प्रदर्शन को लेकर कानून-व्यवस्था की चिंता है, तो प्रशासन को सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए शांतिपूर्ण विरोध का रास्ता भी उपलब्ध कराना चाहिए। लोकतंत्र में असहमति को केवल प्रतिबंधों और पुलिस बंदोबस्त के जरिए नियंत्रित करने की प्रवृत्ति पर गंभीर विमर्श होना चाहिए।
आलम ने कहा कि युवाओं, छात्रों, बेरोजगारों और आम नागरिकों ने तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपनी आवाज उठाने का प्रयास किया। ऐसे सभी नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों और शांतिपूर्ण भागीदारी का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती जनता की जागरूकता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से ही सुनिश्चित हो सकती है।
ज्ञानेश कुमार के मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका अहम:
इन्तेखाब आलम ने कहा कि आज सवाल केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के पद या व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और चुनावी प्रक्रिया पर जनता के भरोसे का भी है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर उठ रहे सवालों का पारदर्शी एवं तथ्यपरक जवाब दिया जाना चाहिए। मतदाता सूची से किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटना उसके लोकतांत्रिक अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।
उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान की निष्पक्षता पर सवाल उठें, तो उनकी अनदेखी करने के बजाय तथ्यों और कानून के आधार पर उनका समाधान होना चाहिए। इस संदर्भ में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि वह अपने समक्ष आने वाले प्रासंगिक मामलों और उपलब्ध कानूनी आधारों पर गंभीरता से विचार करे तथा आवश्यक होने पर उचित न्यायिक हस्तक्षेप करे।
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता के रूप में आलम ने यह भी स्पष्ट किया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत विशेष रूप से संरक्षित है। उन्हें हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के समान है, जिसके लिए संसद में निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया अपनानी होती है। इसलिए न्यायिक संज्ञान, न्यायिक समीक्षा और पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया के बीच अंतर को समझना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखना किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का हित है। सरकार, निर्वाचन आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को जनता के सवालों का जवाब तथ्यों, पारदर्शिता और संविधान के दायरे में देना चाहिए।
आलम ने अंत में कहा कि लोकतंत्र में जनता की आवाज को दबाने के बजाय उसे सुना जाना चाहिए। संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है और इसी अधिकार, संस्थागत जवाबदेही तथा निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया के संरक्षण से देश में लोकतांत्रिक विश्वास मजबूत होगा।
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